Friday, July 6, 2018
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ग़ज़ल-रहमान फ़ारिस, नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है
नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है सौ पेश-ए-यार निगाहें झुकाना बनता है वो लाख बे-ख़बर-ओ-बे-वफ़ा सही लेकिन त...
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1. Khusravi Achhi Lagi Na Sarwari Achhi Lagi Hum Faqeero Ko Madine Ki Gali Achhi Lagi Mai Na Ja...
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दिल को तोड़ के मेरे वो ऐसे अन्जान बैठा है लगता है जैसे कोई मुर्दा बेजान बैठा है गली मे आकर मेरी मुझको ही बदनाम किये बैठा है लबों पर अब भी...
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हक़ीक़त में अपना मैं तुमको बनाकर मैं ले जाऊंगा सबसे तुमको छुपाकर के मेरी रियासत हो तुम..... बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम.... ये माना है मैंने क...

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